अबूझमाड़ में रक्षाबंधन का अनोखा रंग, धागों में झलकी आजादी और भरोसे की चमक

नारायणपुर

नक्सल प्रभावित जिला नारायणपुर का अबूझमाड़, यह वह नाम है जिसे सुनते ही दिमाग़ में जंगलों की अनंत हरियाली के बीच बम, बारूद और गोलियों की गूंज उतर आती थी. दशकों तक नक्सलवाद के साये में जीते लोग, जिनका संसार अपने घर और आसपास के जंगलों तक सीमित था. जहां त्योहारों की रौनक नहीं, बल्कि सन्नाटे और डर का पहरा हुआ करता था. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. सरकार के नक्सलवाद के खात्मे के दृढ़ संकल्प और सुरक्षा बलों की लगातार तैनाती ने इस इलाक़े में भरोसे और सुरक्षा की नई कहानी लिख दी है. वही लोग, जो कभी बंदूक की नोक पर जीते थे, अब क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पर्वों को खुले दिल और पूरे उत्साह के साथ मना रहे हैं.

रक्षाबंधन पर दिखी बदलाव की झलक
इस बदलाव की झलक हाल ही में रक्षाबंधन के पर्व पर देखने को मिली. अबूझमाड़ के सोनपुर, डोड़रीबेड़ा, होरादी, गारपा समेत कई नक्सल प्रभावित गांवों की महिलाएं और बालिकाएं अपने गांव में स्थित पुलिस कैंप पहुंचीं. वहां नक्सल मोर्चे पर तैनात जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हुए उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि गर्व और आत्मीयता की चमक थी.

सीमा सुरक्षा बल की 133वीं वाहिनी के जवानों ने भी ग्रामीणों से वादा किया कि वे हर परिस्थिति में उनकी सुरक्षा करेंगे. महीनों तक घर-परिवार से दूर रहकर नक्सल मोर्चे पर डटे इन जवानों के लिए यह सिर्फ एक औपचारिक पर्व नहीं था,यह उन बहनों का विश्वास था, जिनकी रक्षा के लिए वे अपनी जान दांव पर लगाए हुए हैं.इस कार्यक्रम में आसपास के गांवों के विभिन्न विद्यालयों और आश्रमों से 106 बालिकाएं, 13 शिक्षक और 18 ग्रामीण शामिल कुल 200 नागरिक शामिल हुए. जब नन्हीं-नन्हीं हथेलियों से राखी बांधी गई, तो कई जवानों की आंखें भर आईं. वर्षों से सुरक्षा की आस में जीते इन गांवों में यह दृश्य एक भावनात्मक क्रांति जैसा था ,जहां भाईचारे का धागा, डर की जंजीरों को तोड़ रहा था.

बता दें कि सीमा सुरक्षा बल की भूमिका केवल नक्सल मोर्चे तक सीमित नहीं है. वे अबूझमाड़ के दुर्गम इलाकों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के प्रयासों में भी जुटे हैं. जहां कल तक स्कूल भवन अधूरे या जर्जर थे, वहां अब पढ़ाई की गूंज सुनाई देने लगी है. चिकित्सा सुविधाएं और आवश्यक सेवाएं धीरे-धीरे इन घने जंगलों तक पहुँच रही हैं.यह राह इतना आसान नहीं है, नक्सली विकास कार्यों में रुकावट डालने के लिए आए दिन जवानों पर हमला करते हैं, आईईडी लगाते हैं, और आगजनी की घटनाएं करते हैं. लेकिन सुरक्षा बल भी पीछे हटने वालों में से नहीं,वे हर वार का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं.

नक्सलवाद धीरे-धीरे बैकफुट पर जाने लगा है, और अबूझमाड़ के लोग महसूस करने लगे हैं कि वे वास्तव में आज़ाद हो रहे हैं.आज अबूझमाड़ के गांवों में रक्षाबंधन ही नहीं, दीपावली, होली और स्वतंत्रता दिवस जैसे त्योहार भी उल्लास से मनाए जाते हैं. हर उत्सव में सुरक्षा बलों को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि इन ग्रामीणों के लिए वे सिर्फ रक्षक नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा बन चुके हैं.अबूझमाड़ की फिजा में अब विश्वास, भाईचारे और बदलती हुई हवा, जिसमें अब गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि ढोल-नगाड़ों और हंसी की आवाज़ सुनाई देती है.

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