धनतेरस पर 1 दिया जलाने से खत्म होता है अकाल मृत्यु का खतरा

किसी राज्य में हेम नामक राजा था. ईश्वर की कृपा से उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ. बेटे की कुंडली में लिखा था कि शादी के चार दिन बाद राजकुमार की मृत्यु हो जाएगी. ऐसे में राजा ने उसे ऐसी जगह भेज दिया, जहां किसी लड़की की परछाई भी उस पर न पड़े लेकिन वहां उन्होंने एक राजकुमारी से विवाह कर लिया. रीति के अनुसार, विवाह के चौथे दिन यमराज के दूत राजकुमार के पास आ गए. राजकुमार की पत्नी विलाप करने लगी और दूतों से अकाल मृत्यु से बचने का उपाय जाना. दूतों ने ये सारी बातें यमराज को बताई. यमराज ने बताया कि मृत्यु अटल है, लेकिन धनतेरस के दिन यानी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन जो व्यक्ति दीप प्रज्वलित करेगा वह अकाल मृत्यु से बच सकता है. इसी कारण से हर साल धनतेरस पर यम का दीपक जलाने की परंपरा है.

यम का दीपक जलाने का महत्व:

1. ज्योतिष के मुताबिक, घर की दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज होते हैं.
2. पौराणिक मान्यता है कि धनतेरस पर दक्षिण दिशा में यम का दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं.
3. इससे घर में सुख-शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है.
4. स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भी यम के दीपक का वर्णन मिलता है.

 

यम का दीपक क्यों जलाया जाता है:

धनतेरस की शाम को मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करने से साथ यमराज को प्रसन्न करने के लिए भी पूजन किया जाता है. घर की दक्षिण दिशा में एक चार मुख वाला दीपक जलाया जाता है. इस चार मुख वाले दीपक को ही ‘यम का दीपक’ कहा जाता है. ज्योतिष के मुताबिक, घर की दक्षिण दिशा की स्वामी यमराज होते हैं. पौराणिक मान्यता है कि धनतेरस पर दक्षिण दिशा में यम का दीपक लगाने से यमराज प्रसन्न होते हैं. घर में सुख-शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है.

 

ऐसे जलाएं ‘यम का दीपक’:

धनतेरस के दिन आटे का चौमुखा दीपक बनाएं और उसमें सरसों का तेल भरें, इसमें चार बाती लगाकर घर की दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाएं. इसके अलावा घर के मुख्य द्वार पर गाय के घी का दीपक जलाने से मां लक्ष्‍मी प्रसन्‍न होती हैं और खूब धन-संपत्ति देती हैं.धनतेरस के दिन सूर्सास्त के बाद शाम को ही यमराज के निमित्त दीपक जलाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि दीपदान से यमदेव प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु से सुरक्षा करते है. धनतेरस की शाम घर के बाहर 13 दीपक जलाए. इन्हें मुख्य द्वार पर रखें. वहीं, एक पुराना मिट्टी के दीपक में चार बाती लगा लें और इसे सरसों के तेल से प्रज्वलित करें. अब घर के बाहर दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके इस दीपक को जलाएं और मंत्र उच्चारण करते हुए इसे रखें.

मंत्र : मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह, त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति’ 

कहते हैं इससे अकाल मृत्यु का भय खत्म हो जाता है और नर्क की यातनाएं नहीं सहनी पड़ती.
 

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